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Sunday, 9 April 2017

जिंदगी


वक़्त की चोट है घाव पहचान गया हूँ जिंदगी
किस्मत के राज आज मै जान गया हूँ जिंदगी 
महफ़िलें आज जमा है क्यों आज मेरे वास्ते
आज तो मै जीत के भी हार गया हूँ जिंदगी
साथ मेरा दे रहे आज जो ये महफ़िल में हैं
जाने क्यों मैं आज इन्हे न पहचान रहा हूँ जिंदगी
दर्द भर चुका है आज मेरे सीने में ऊबाल सा
चोट भी आज मेरी पहचान है जिंदगी
लब्ज में आता सिर्फ अब एक नाम है
"माँ" तू ही शुरुआत है तू ही अंत का धाम है...


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